हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मेलबर्न में शिया उलेमा काउंसिल ऑस्ट्रेलिया के अध्यक्ष और इमामे जुमा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मौलाना सय्यद अबुलकासिम रिज़वी ने जुमे के खुतबे में समाज सुधार, हलाल रोज़ी की अहमियत, दुआ की क़बूलियत और मौजूदा वैश्विक हालात पर चर्चा करते हुए कहा कि सुधार का सफर हमेशा अपने से शुरू होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इंसान को दूसरों के सुधार की चिंता करने से पहले अपने चरित्र, कर्म और जीवनशैली की समीक्षा करना चाहिए, क्योंकि वास्तविक सुधार की शुरुआत इंसान के अपने भीतर से होती है। उनका कहना था कि समाज में सकारात्मक बदलाव तभी संभव है, जब हर व्यक्ति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करते हुए अपने सुधार की कोशिश करे।
मौलाना सय्यद अबुलकासिम रिज़वी ने आगे कहा कि इंसान को उन लोगों से भयभीत नहीं होना चाहिए, जो बदला लेने की क्षमता रखते हैं, बल्कि उन लोगों के मामले में अधिक सावधान रहना चाहिए, जो अपना मामला अल्लाह के हवाले कर देते हैं। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपना मामला अल्लाह तआला के सुपुर्द कर देता है, उसका भरोसा और धैर्य उसे एक विशेष शक्ति प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में कभी-कभी इंसान का सामना ऐसे लोगों से होता है, जो उसके लिए अपने दरवाज़े बंद कर देते हैं, लेकिन इंसान को निराश होने के बजाय अपने सम्मान और आत्मसम्मान को बनाए रखना चाहिए। उन्होंने कहा, “जो आपके लिए दरवाज़ा बंद कर दे, उसे यह एहसास करा दें कि कुंडी दोनों तरफ होती है।”
हलाल रोज़ी और दुआ की क़बूलियत
जुमे के खुतबे में मौलाना सय्यद अबुलकासिम रिज़वी ने हलाल रोज़ी की अहमियत बयान करते हुए पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) की एक हदीस पेश की:
مَنْ أَكَلَ مِنَ الْحَلَالِ الْقُوتَ صَفَا قَلْبُهُ وَرَقَّ وَدَمَعَتْ عَيْنَاهُ وَلَمْ يَكُنْ لِدَعْوَتِهِ حِجَابٌ
उन्होंने इस हदीस का अर्थ बयान करते हुए कहा कि रसूले ख़ुदा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.) ने फ़रमाया कि जो व्यक्ति हलाल निवाला खाता है, उसका दिल पाकीज़ा और नरम हो जाता है, उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं और उसकी दुआ की क़बूलियत में कोई रुकावट नहीं रहती।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हलाल रोज़ी केवल इंसान के बाहरी चरित्र को प्रभावित नहीं करती, बल्कि उसके आध्यात्मिक और नैतिक व्यक्तित्व को भी संवारती है। पाकीज़ा रोज़ी इंसान के दिल में नरमी और ख़ुशू पैदा करती है तथा अल्लाह तआला से उसके संबंध को मज़बूत करती है।
इमाम ज़माना (अ.) के ज़ुहूर की उम्मीद और वैश्विक हालात
मौलाना सय्यद अबुलकासिम रिज़वी ने खुतबे के दौरान मौजूदा वैश्विक हालात का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्हम्दुलिल्लाह, यह हक़ के बुलंद होने और बातिल के पतन का दौर है और हम इमाम ज़माना (अ.) के ज़ुहूर के और क़रीब होते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हक़ की आवाज़ अब वैश्विक स्तर पर भी सुनी जा रही है और न्यूयॉर्क के सदनों तक उसकी गूंज पहुंच चुकी है। उन्होंने इसे अपने बयान के अनुसार, रहबर की शहादत का फल बताते हुए कहा कि ईरान की आवाज़ पूरी दुनिया सुन रही है और उनके अनुसार इज़राइल वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ता जा रहा है।
मौलाना सैयद अबुलकासिम रिज़वी ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में ईमान वालों को उम्मीद, धैर्य, दृढ़ता और अपने धार्मिक एवं नैतिक दायित्वों पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए। उनके अनुसार, हक़ और बातिल की कशमकश में सफलता के लिए ज़रूरी है कि इंसान सबसे पहले अपनी ज़ात का सुधार करे, हलाल रोज़ी अपनाए, अल्लाह तआला पर भरोसा रखे और अपने चरित्र एवं कर्म के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव का ज़रिया बने।
आपकी टिप्पणी